एक बिखरा ख्याल.....
वो तो मुझे वेसे देखता ही नही, जैसे मैं उसी देखती हूँ।
बो मेरी कहानी मे मिलता ही नही, जिसकी मैं बनाना चाहती हूँ।
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ये एक वो ख्याल है, जो हक़ीक़त से मिलता नही।
और अगर मिल जाए तो इंकार कर देता है।
इंकार का कारण वो खुद नही जानता,
बस बह लाता है मन ही मन बातो मे फसा के।
इस भरोसे की दीवार को वो लांग कर,
करता है पेश तमाम दलीले।
कुछ मुझसे मिलकर तकरार पार होजाती है,
कुछ वही कर लेती है घर।
इतना आसान है क्या ये दीवार बनाकर तोड़ देना?


बहुत सादगी से कही गई बहुत गहरी बात।
ये पंक्तियाँ पढ़कर लगा जैसे किसी ने भीतर की दीवारों पर हल्के से दस्तक दी हो।
Veryy beautifully put dii. <3