आधे दिन की तलाश या थकान।
आधे दिन मे,
मैं बाँट लेता हूँ,
सारी बातें, सारी परेशानिया,
शेष रह जाता है,
मन मे घुन्जता शोर,
गायकी के पीछे,
ये करे बहाने बेढंग,
बेमतलब, बेकार के।
अब किसे चुने,
ढंग या बेवजह सी बातों को,
जो मिले तो तबाही,
ना मिले तो जवाबी।
किस तरह समझाऊँ,
मन मे चलते चलचित्र को,
की घोर अंधेरा है,
पथ मे आगे,
जहाँ ढूँढ रहे सुकून है,
वहा कांटे बैठे तेयार है।
तो मिटा आधे दिन.. "नही"
आधे जीवन की थकान को,
और मिल जाओ,
वीराने की आग मे,
लिप्त कर उसमे पूछना,
अपना वजूद,
उसकी मौजूदगी।
-रित्ती



खूबसूरत रचना👏👏👏
Wow.. bahut pyaara likha hai and the narration is so melodious and pleasant to listen to!! 👏