साल अंत करीब है...
कितना कुछ बदल रही हो? पर सवाल ये है की, सबसे परे खुदसे मिल रही हो?
साल अंत करीब है,
तो पूछोगे नही..
ठहर जाओगी या…
खैर वो छोड़ो।
साल कैसा बिता,
कितनी यादें समेटी,
कितने फलसफे बने,
कितनी कहानियाँ बनाई,
ज्यादा तो नही पूछा,
बस पूछ रहे हाल तुम्हारा।
कही नाराज तो नही हमसे,
हम मनाने मे तंग है,
जुबान जरा नाकाम है,
मन कुछ पराया है,
तो बताओ ना..
क्या समेट रही हो साल अंत मे,
जमाने से नाराजगी,
ख्वाबो की चोरी,
या खुदके आत्मविश्वास को?
अच्छा!
क्या खुदसे मिल पाई हो?
सबसे परे आसमां मे,
अपनी पहचान बना पाई हो?
उन फूलों से तुम मिली थी,
वो अब मुस्कुराते है ना?
पानी मे डूबते तो नही?
जिस कोयल से टकराई थी,
वो सूरो मे प्रेम गाती है ना अब?
या अपने गम छुपाती है कही?
वो पायल जो तुम लाई थी?
अब भो छनक्ति है क्या?
साल अंत है..
कितना कुछ बदल रही हो?
पर सवाल ये है की,
सबसे परे खुदसे मिल रही हो?
-रित्ती



Waahhh.. Ritika. Bahut aachi laagi ye poem. Made me introspect and ask myself a lot of questions. I love this conversational style of poetry. Really enjoyed this one!! ♥️🙌
Wowwwww🥹😍😍
Kitni Sundar kavita hai yeh.
And it was very relatable too yr.
Loved it so much 🥹💖💖💖