मैं शायद तुम्हारी कहानी नही...
गुड़हल सी व्यथा
मैं शायद तुम्हारी कहानी नही
पर तुमसे मिलती हर रोज हूँ।
उन सभी बातो मे बैठी हूँ,
जो हुई थी और होने को बेताब है।
नाम शायद बेनाब ही रहे,
पर आरज़ू संपूर्ण सी रहे मन मे।
सुनना जानना ख्याल से परे है,
तेरा होना ही साकार जवाब है।
अब निराकार अधेरे मे खोजती हूँ,
पता तेरी खामोशी और मौजूदगी का।
क्या बुन रहे थे, क्या सोच रहे है,
सबका हिसाब लगा रही हू दूर से।
एक क्षण तुम प्रेम मे समाये थे,
दूजे मे किनारे पे ही पाए थे।
क्या मेरा क्या तेरा,
सब जुड़ जायेगा एक दिन,
रूह के भीतर,
समंदर से ऊपर,
जलवायु की शाखा मे,
तेरे उम्मीद मे,
मेरे जज्बात मे,
दीप की लोह मे,
प्रेम की आह मे।
-रित्ती


This was really quite a beautiful one. Loved it <33