आखिरी खत...
वो रात अब चली गई
वो बात वही ठहर गई
ना आगे उसने बताना चाहा
ना आगे मैने जानना चाहा
बात जो थी, उससे वो भी खफा थी
क्या बताती मुझे वो
अब वो कर चुकी खुदको उसके नाम
और वो बताती किन लफ्जों में
की अब वो चाह कर भी हमारी नहीं
मेहंदी लगवा के वो बैठी है
किसी ओर के नाम का लाल जोड़ा पहनेगी
कमबख्त इश्क़ है
की तुझे अपने से दूर किया है
यादों के सहारे अब में जिया बैठा हूं
और दिखाऊं तुझे
क्या खोकर क्या पाया है तूने!
शायद खोने से पहले ही किया था दूर तूने,
कुछ बहानों से, कुछ निराकार पैमानों पर,
और हम खड़े यूंही तेरे इंतेज़ार में...
तू सोचे गर मैं टूट जाऊ,
तो ऐसे गलतफहमी ना पाल,
मैं सम्पूर्ण हूं स्वयं में,
तू थी तो क्या बात थी,
तू नहीं है तो भी ग़म तो नहीं,
तेरी खुशी के आगे,
अब ये कुछ भी नहीं...
-एक कहानी।
-रित्ती❤️
An audio series by Wordsbyritti


You've written it so well and your voice is literally complementing it so beautifully!! 🤌
you won't believe but I wrote something very similar. at least the starting was similar.
as usual bahut umda likhi h kavita :)